अनूपपुर

राज्यपाल के कार्यक्रम में जनजाति समाज के लोगों के जीवन को खतरे में डालने की साजिश

विधायक पुष्पराजगढ़ ने खड़े किए कई सवाल खड़े किए प्रश्नचिन्ह

अनूपपुर/पुष्पराजगढ़। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविदयालय में 07 अक्टूबर को सिकल सेल की बीमारी से पीड़ितों का ब्लड जाँच, सिकल सेल की बिमारी से उपचार एवं उसके लाभार्थी जनजातीय भाई-बहनों से चर्चा कार्यक्रम में मुख्य अतिथि महामहिम राज्यपाल मंगुभाई पटेल के समक्ष सिकल सेल की बीमारी पर विश्वविद्यालय प्रशासन के लोग खूब वाहवही बटोरी थी। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय प्रशासन ने सिकल सेल की बीमारी से पीड़ित लोगों के ब्लड-सैम्पल लेने, ब्लड-सैम्पल की जाँच करने, उन्हें दवा देने तथा अनूपपुर में 400 लोगों में सिकल सेल की बीमारी की पहचान करने की बात बतायी। जबकि ऐसा करने के लिए विश्वविद्यालय के प्रोजेक्ट के स्टाफ किसी भी तरीके से अधिकृत नहीं है, यह घटना कार्यक्रम में उपस्थित समस्त लोगों के आँख में धूल झोकने तथा अपराध को छुपाने का मामला है। प्रोजेक्ट में फर्जी स्टाफ, फर्जी प्रयोगशाला में सिकल सेल ब्लड सैम्पल का जाँच करने वालो पर एफआईआर दर्ज करने की जरुरत है। आज यह बात फुन्देलाल मार्कों विधायक, पुष्पराजगढ़ ने मीडिया को बताया। फुन्देलाल मार्कों ने कहा कि अनूपपुर जिला में सिकल सेल बीमारी के संबंध में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने जनजातीय विश्वविद्यालय एक प्रोजेक्ट दिया,जिसके अंतर्गत 4 पदों के लिए एक विज्ञापन अगस्त 2019 को जारी किया गया था,जिसमें साइंटिस्ट-सी, रिसर्च असिस्टेंट असिस्टेंट तथा लैबोरेट्री टेक्निशियन पद पर भर्ती के लिए विज्ञापन प्रकाशित किया गया था। विज्ञापन को प्रकाशित करने में विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने लोगों को लाभ दिलाने के लिए बहुत ही कपटी ढंग से न्यूनतम आहर्ता के लिए आईसीएमआर से निर्धारित योग्यता के विपरीत गलत मापदंड तय कर दिया। साइंटिस्ट-सी के पद पर प्रोजेक्ट की पीआई श्रीदेवी ने स्वयं साक्षात्कार समिति में बैठकर अपने पति का चयन साइंटिस्ट-सी के पद पर कर दिया तथा उसके इस गलत कार्य में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति तथा विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता भूमिनाथ त्रिपाठी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। रिसर्च असिस्टेंट साइंटिस्ट-सी तथा लैबोरेट्री टेक्निशियन सभी पदों पर भर्ती के लिए जो न्यूनतम आहर्ता तय की गई वह आईसीएमआर की गाइड लाइन के अनुसार नहीं थी। भारत का राजपत्र स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधिसूचना दिनांक 18 मई 2018 के अनुसार नैदानिक स्थापना अधिनियम 2010 की धारा 52 के अनुसार स्वास्थ्य से जुड़ी हुई प्रयोगशाला, रोगविज्ञान प्रयोगशाला के लिए न्यूनतम मानक, निदान तथा प्रमाणीकृत प्रयोगशालाओं में कार्य करने वाले लोगों के लिए न्यूनतम आहर्ता निर्धारित है। सिकलसेल एक जेनेटिक समस्या तथा जेनेटिक बीमारी है, जिसमें ब्लड सैंपल लेकर उसकी जांच होती है, ब्लड-सैंपल की जांच के लिए रोगविज्ञान चिकित्सा नैदानिक प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है और ऐसी प्रयोगशाला को शुरू करने तथा उसमें ब्लड सैंपल की जांच करने के लिए निर्धारित अधोसंरचना, उसका प्रमाणीकरण तथा उसमें सुरक्षा के सभी मापदंड के साथ-साथ उसमें मानव संसाधन तथा प्रयोगशाला के तकनीकी विशेषज्ञ की अधिकृत हस्ताक्षर से रिपोर्ट जारी किए जाने का प्रावधान है। ऐसी प्रमाणीकृत प्रयोगशाला में जहां पर सिकलसेल बीमारी के लिए ब्लड सैंपल लेकर उसकी जांच करने के लिए निर्धारित मापदंड आईसीएमआर की गाइडलाइन तथा भारत के राजपत्र में बने हुए कानून के अनुसार स्पष्ट परिभाषित है। जिसके अनुसार प्रयोगशाला के तकनीकी अध्यक्ष या विशेषज्ञ या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता की न्यूनतम आहर्ता आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार आवश्यक एवं अनिवार्य है कि वह किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/संस्थान से बैचलर आफ मेडिसिन एवं बैचलर ऑफ सर्जरी (एमबीबीएस) की डिग्री आवश्यकता यह भी है कि विकृति विज्ञान/जीव रसायन/चिकित्सा विज्ञान प्रयोगशाला चिकित्सा में डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (एमडी) या डिप्लोमा ऑफ नेशनल बोर्ड (डीएनबी) या क्लीनिकल विकृति विज्ञान में डिप्लोमा (डीसीपी) बैचलर ऑफ मेडिसिन फॉर बैचलर ऑफ सर्जरी एमबीबीएस सहित उपयुक्त विषयों में से किसी एक में डॉक्टर आफ फिलासफी (पीएचडी) होना अनिवार्य है, सिकल सेल बीमारी के ब्लड सैम्पल की जाँच प्रयोगशाला के परिणामों का निर्वचन के संबंध में रजिस्ट्रीकृत प्रोजेक्ट स्टाफ आवश्यक है, लेकिन विश्वविद्यालय के प्रोजेक्ट में ना तो एक भी नर्सिंग स्टाफ नियुक्त किए गए है, ना तो एमडी, ना ही डीएनबी और ना ही डीसीपी। एक भी प्रोजेक्ट स्टाफ आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार नियुक्त नहीं किए गए है, लेकिन विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के द्वारा समय-समय पर सिकल सेल के नाम पर जनजातियों की स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है तथा जनजातियों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करके जनजातीय मानव के जीवन के लिए खतरा पैदा किया गया है। विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के स्टाफ किसी व्यक्ति का ब्लड-सैंपल लेने के लिए योग्य ही नहीं है, ना ही वे ब्लड-सैंपल की जाँच करने के लिए पात्र है। आईसीएमआर ने तथा मध्यप्रदेश की सम्बंधित एजेन्सी ने विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के किसी भी स्टाफ को ब्लड-सैंपल लेने तथा उसकी जांच करने के लिए पंजीकृत नहीं किया है क्योंकि एक भी प्रोजेक्ट स्टाफ आईसीएमआर के गाइडलाइन के अनुसार न्यूनतम अहर्ता ही नहीं रखते है। इसके अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जाकर नर्स को भी गैरकानूनी ढंग से प्रशिक्षित कर रहे हैं, जबकि प्रशिक्षित करने वाले प्रोजेक्ट के स्टाफ खुद ही अयोग्य हैं। यह एकप्रकार से जनजातीय समाज के लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ तथा उनकी जीवन के लिए खतरा पैदा करने का अपराध है। फुन्देलाल मार्कों ने आगे कहा कि म.प्र. शासन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा समस्त कलेक्टर एवं जिला पुलिस अधीक्षको को निर्देशित कर फर्जी स्टाफ एवं अवैध रूप से चिकित्सा के क्षेत्र में आईसीएमआर के विरुद्ध कार्य कर रहे लोगों के विरूद्ध कार्यवाही के लिए निर्देशित किया गया है। इसके बावजूद भी आदिवासी बाहुल्य तहसील पुष्पराजगढ़ में अवैध कार्य द्वारा धड़ल्ले से विश्वविद्यालय द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। म.प्र. मेडिकल काउन्सिल के अंतर्गत अपात्र एवं अपंजीकृत व्यक्तियों द्वारा सिकल सेल का ब्लड सैम्पल लेकर चेक करने पर म.प्र. मेडिकल काउन्सिल एक्ट 1987 की धारा 24 के तहत तीन वर्ष तक के कठोर कारावास एवं पांच हजार रूपये जुर्माना का प्रावधान है। विश्वविद्यालय के दोषी अधिकारियों के विरूध्द एफआईआर दर्ज करते हुए दण्डात्मक कार्यवाही करने की आवश्यकता है ताकि अवैध कार्यो पर रोक लगाई जा सके। फुन्देलाल मार्कों ने आगे कहा कि सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, जिला प्रशासन और संभाग प्रशासन के अधिकारियों से मिलकर राज्यपाल महोदय को ही गुमराह करके जनजातीय भाई-बहन को ठग लिया है तथा सिकल सेल के नाम पर उन्हें भी बेवकूफ बनाने का प्रयास किया है। मीडिया के सामने वाहवाही लूट कर एक बेशर्मी का अपराध का सीमा विश्वविद्यालय ने पार कर दिया है, जो अत्यंत दुखद और शर्मनाक हरकत है। सिकल सेल पीड़ितों को विशेषज्ञ की सेवाएं मिलनी चाहिए थी लेकिन भाई-भतीजावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद में मदमस्त विश्वविद्यालय प्रशासन जनजातियों के जीवन एवं स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया है। वैध डिग्री के बगैर चल रहे सिकल सेल लैब में ब्लड सैम्पल की जाँच झोलाछाप स्टाफ कर रहे है, वैधानिक सर्टिफिकेट नहीं होने के बावजूद अनूपपुर में फल-फूल रहे झोलाछाप स्टाफ सिकल सेल में मनमानी रिपोर्ट दे रहे है, संभाग तथा जिला के अधिकारी विश्वविद्यालय पर कदर मेहरबान है की राज्यपाल महोदय के कार्यक्रम में फर्जी जानकारी देने की तैयारी करवाने का कार्य कर रहे थे। फुन्देलाल मार्कों ने आगे कहा कि राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने जनजातीय विश्वविद्यालय परिसर में बनाए गए उत्कृष्टता केन्द्र का फीता काटकर लोकार्पण किया उस जनजातीय संकाय में एक भी जनजातीय छात्रों को वर्ष 2021 में पीएचडी में प्रवेश नहीं दिया गया है वह भी उत्कृष्टता-केन्द्र के बजाय भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु है। फुन्देलाल मार्कों ने जिलाधीश तथा पुलिस अधीक्षक से माँग की है कि इस गंभीर मामले में मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के सामने फर्जी बनावटी जानकारी देने, आईसीएमआर गाइडलाइन के विरुद्ध जनजातीय समाज के लोगों के जीवन को खतरे में डालने, अपने पति को लाभ पहुँचाने के लिए छल करके समाज के विरुद्ध अपराध करने के जुर्म में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकटंक के झोलाछाप कार्यक्रम-संचालकों के खिलाफ इंडियन मेडिकल काउंसलिंग एक्ट 1956 की धारा 15 (2), 15(3), भारतीय दंड संहिता आईपीसी की धारा 336, 337, 338, 420 और ड्रग एक्ट की धारा 18 (ए,सी) के तहत तत्काल आपराधिक मामला एफआईआर दर्ज करके दोषियों की गिरफ्तारी किया जाए, अन्यथा जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले विश्वविद्यालय प्रशासन के कतिपय अधिकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन एवं धरना प्रदर्शन किया जाएगा। पुष्पराजगढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक फुन्देलाल मार्कों ने शिकायत की प्रतिलिपि महामहिम राष्ट्रपति, राज्यपाल, भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, अध्यक्ष, राष्ट्रीय जनजातीय आयोग हर्ष चौहान, पुलिस महानिदेशक, सचिव डीएचआर और महानिदेशक आईसीएमआर प्रो. बलराम भार्गव, सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग डॉ रेणु स्वरूप को भी प्रेषित किया है।
कलेक्टर पुलिस अधीक्षक थाना प्रभारी से की शिकायत
पुष्पराजगढ़ विधानसभा क्षेत्र की विधायक फुन्देलाल सिंह मार्कों ने अनूपपुर जिले के कलेक्टर पुलिस अधीक्षक एवं अमरकंटक थाना प्रभारी को लिखित में शिकायत भी दी है और जांच की मांग की है उन्होंने लेख किया है कि 07 अक्टूबर 2021 को इन्दिरा गांधी जनजातीय राष्ट्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक में सिकल सेल की बीमारी से पीड़ितों का ब्लड जाँच, सिकल सेल की बीमारी से उपचार एवं उसके लाभार्थी जनजातीय भाई बहनों से चर्चा कार्यक्रम में सिकल सेल की बीमारी पर विश्वविद्यालय प्रशासन के लोग खूब वाहवही बटोरी थी। प्रदेश के महामहिम राज्यपाल मंगुभाई पटेल कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, महामहिम राज्यपाल के अलावा में पुष्पराजगढ़ विधायक फुन्देलाल सिंह मार्को, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती रूपमती सिंह, कुलाधिपति डॉ. मुकुल ईश्वरलाल शाह, कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, कमिश्नर शहडोल संभाग राजीव शर्मा, एडीजी दिनेश चंद्र सागर, कलेक्टर अनूपपुर सुश्री सोनिया मीना, पुलिस अधीक्षक अखिल पटेल, विश्वविद्यालय कार्य समिति के सदस्य नरेन्द्र मरावी, पूर्व विधायक सुदामा सिंह, रामलाल रौतेल, स्वयंसेवी सामाजिक संगठनों के सदस्य भी वहाँ उपस्थित थे। चर्चा में सिकल सेल की बीमारी से पीड़ित तरुण कुमार मोगरे, गंगोत्री भीमटे सहित कुछ पीएचसी स्टाफ मौजूद थे। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय प्रशासन ने सिकल सेल की बीमारी से पीड़ित लोगों के ब्लड-सैम्पल लेने, ब्लड-सैम्पल की जाँच करने, उन्हें दवा देने तथा अनूपपुर में 400 लोगों में सिकल सेल की बीमारी की पहचान करने की बात बतायी। जबकि ऐसा करने के लिए विश्वविद्यालय के प्रोजेक्ट के स्टाफ किसी भी तरीके से अधिकृत नहीं है यह घटना उपस्थित समस्त लोगों के आँख में धूल झोकने तथा अपराध को छुपाने के लिए फोटो सेसन कराने का मामला है। प्रोजेक्ट में फर्जी स्टाफ, फर्जी प्रयोगशाला में सिकल सेल ब्लड सैम्पल का जाँच करने वालो पर एफआईआर दर्ज करने की जरुरत है। प्रदेश के महामहिम राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा है कि मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग रहते हैं, प्रदेश की लगभग 21 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। आदिवासी समाज आज भी विकास की रफ्तार में काफी पीछे है। राज्यपाल ने कहा है कि आदिवासियों के सर्वांगीण विकास में हम सबकी भागीदारी होनी चाहिए। सिकल सेल की बीमारी जनजातीय क्षेत्रों में ज्यादा फैली है। सिकल सेल की बीमारी में स्वास्थ्य संबंधी कई विकार उत्पन्न होते है। महामहिम राज्यपाल ने कहा कि सिकल सेल से पीड़ित मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टरों, चिकित्सकों के सेवाएं भी मिलना चाहिए। राज्यपाल ने कहा कि सिकल सेल बीमारी को समूल रूप से कैसे नष्ट किया जाए, इसके भी प्रयास होने चाहिए। मध्यप्रदेश में सिकल रोग बीमारी है तथा सिकल सेल बीमारी पर शोध के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के बॉयोटेक विभाग की अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ.पी श्रीदेवी को एक महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट मंजूर किया है, जिसमें सिकल सेल बीमारी पर अनूपपुर जिले की सिकल सेल रोग के लिए कार्य होना था। प्रोजेक्ट का शीर्षक -इंप्रूविंग द कैपेसिटी ऑफ हैल्थ सिस्टम एंड कम्युनिटी फॉर सिकल सेल डिजिज स्क्रीनिंग एंड मैनेजमेंट-एन इंटरवेंशन स्टडी इन अनूपपुर डिस्ट्रिक्ट-शीर्षक के इस प्रोजेक्ट में अनूपपुर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं और यहां के सिकल सेल बीमारी से पीड़ित रोगियों पर शोध होना था। शोध के अंतर्गत स्वास्थ्य अधिकारियों, कर्मचारियों और सिकल रोगी ध् ग्रामीणों के मध्य शोध किया जाना था। जिससे इस बीमारी के प्रभावी इलाज के बारे में कार्ययोजना तैयार की जा सके। तीन वर्ष के इस शोध से प्राप्त नतीजों को रिपोर्ट के रूप में आईसीएमआर को सौंपा जाना है। आईसीएमआर प्रोजेक्ट के अंतर्गत 4 पदों के लिए एक विज्ञापन अगस्त 2019 को जारी किया गया था, जिसमें पहला पद साइंटिस्ट-सी, तथा रिसर्च असिस्टेंट असिस्टेंट का 2 पद तथा लैबोरेट्री टेक्निशियन का एक पद कुल 4 पद के लिए विज्ञापन प्रकाशित किया गया था। साइंटिस्ट-सी के पद के लिए प्रतिमाह रुपए 51 हजार का वेतन के साथ-साथ अलग से एचआरए दिए जाने का प्रावधान है, तथा रिसर्च असिस्टेंट हेतु रुपए 31000 प्रतिमाह का वेतन है तथा लैबोरेट्री टेक्नीशियन के लिए रुपए 18000 का प्रतिमाह वेतन है। प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ही भ्रष्टाचार बड़े स्तर पर शुरू कर दिया गया तथा विज्ञापन को प्रकाशित करने में विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने लोगों को लाभ दिलाने के लिए बहुत ही कपटी ढंग से निर्धारित योग्यता में न्यूनतम आहर्ता के लिए गलत-योग्यता का मापदंड तय कर दिया। चूँकि साइंटिस्ट-सी के पद पर आईसीएमआर के गाइडलाइन के अनुसार भर्ती की जानी थी, वहां पर अपने परिचितों को लाभ देने के लिए गलत आहर्ता तय कर दिया गया तथा प्रोजेक्ट की पीआई श्रीदेवी ने स्वयं साक्षात्कार में बैठकर अपने पति का चयन साइंटिस्ट-सी के पद पर कर दिया तथा उसके इस गलत कार्य में विश्वविद्यालय के कुलपति तथा विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता भूमिनाथ त्रिपाठी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। रिसर्च असिस्टेंट, साइंटिस्ट-सी तथा लैबोरेट्री टेक्निशियन सभी पदों पर भर्ती के लिए जो न्यूनतम अहर्ता तय की गई वह आईसीएमआर की गाइड लाइन के अनुसार नहीं थी। म.प्र. शासन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा समस्त कलेक्टर एवं जिला पुलिस अधीक्षको को निर्देशित कर फर्जी स्टाफ एवं अवैध रूप से चिकित्सा के क्षेत्र में आईसीएमआर के विरुद्ध कार्य कर रहे लोगों के विरूध्द कार्यवाही के लिए निर्देशित किया गया है। इसके बावजूद भी आदिवासी बाहुल्य तहसील पुष्पराजगढ़ में अवैध कार्य द्वारा धड़ल्ले से विश्वविद्यालय द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। म.प्र. मेडिकल काउन्सिल के अंतर्गत अपात्र एवं अपंजीकृत व्यक्तियों द्वारा सिकल सेल का ब्लड सैम्पल लेकर चेक करने पर म.प्र. मेडिकल काउन्सिल एक्ट 1987 की धारा 24 के तहत तीन वर्ष तक के कठोर कारावास एवं पांच हजार रूपये जुर्माना का प्रावधान है। विश्वविद्यालय के खिलाफ शिकायत करते हुए दोषी अधिकारियों के विरूध्द एफआईआर दर्ज करते हुए दण्डात्मक कार्यवाही करने की आवश्यकता है ताकि अवैध कार्यो पर रोक लगाई जा सके। अपने परिचितों को लाभ देने के लिए इस प्रोजेक्ट का संचालन किया जा रहा है, जनजातियों की हित की बात करना तथा जनजातियों के नाम पर राज्यपाल को बुलाना या जिला प्रशासन और संभाग के उच्च अधिकारियों को बुलाना केवल दिखावा था तथा गुमराह करने की ओछी हरकत है। सच्चाई यह है कि जनजातियों के हित के लिए तथा अनूपपुर जिले एवं राजेंद्रग्राम वासियों के लिए सरकार के रुपए से चलने वाला यह प्रोजेक्ट में केवल भ्रष्टाचार, धोखा तथा जनजातीय मानव के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ तथा उनके जीवन को खतरे में डालने जैसा कार्य किया जा रहा है। क्योंकि आईसीएमआर के निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार किसी भी ब्लड सैंपल की जांच के लिए अधिकृत पैथोलॉजी, अधिकृत लेबोरेटरी तथा उसमें जांच करने के लिए मानव संसाधन की न्यूनतम अहर्ता निर्धारित की गई है। भारत का राजपत्र स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधिसूचना दिनांक 18 मई 2018 के अनुसार नैदानिक स्थापना अधिनियम 2010 की धारा 52 के अनुसार स्वास्थ्य से जुड़ी हुई प्रयोगशाला, रोगविज्ञान प्रयोगशाला के लिए न्यूनतम मानक, निदान तथा प्रमाणीकृत प्रयोगशालाओं में कार्य करने वाले लोगों के लिए न्यूनतम आहर्ता निर्धारित है। सिकलसेल एक जेनेटिक समस्या तथा जेनेटिक बीमारी है, जिसमें ब्लड सैंपल लेकर उसकी जांच होती है, ब्लड-सैंपल की जांच के लिए रोगविज्ञान चिकित्सा नैदानिक प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है और ऐसी प्रयोगशाला को शुरू करने तथा उसमें ब्लड सैंपल की जांच करने के लिए निर्धारित अधोसंरचना, उसका प्रमाणीकरण तथा उसमें सुरक्षा के सभी मापदंड के साथ-साथ उसमें मानव संसाधन तथा प्रयोगशाला के तकनीकी विशेषज्ञ की अधिकृत हस्ताक्षर से रिपोर्ट जारी किए जाने का प्रावधान है। ऐसी प्रमाणीकृत प्रयोगशाला में जहां पर सिकलसेल बीमारी के लिए ब्लड सैंपल लेकर उसकी जांच करने के लिए निर्धारित मापदंड आईसीएमआर की गाइडलाइन तथा भारत के राजपत्र में बने हुए कानून के अनुसार स्पष्ट परिभाषित है। जिसके अनुसार प्रयोगशाला के तकनीकी अध्यक्ष या विशेषज्ञ या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता की न्यूनतम आहर्ता आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार आवश्यक एवं अनिवार्य है कि वह किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय ध् संस्थान से बैचलर आफ मेडिसिन एवं बैचलर ऑफ सर्जरी (एमबीबीएस) की डिग्री आवश्यकता यह भी है कि विकृति विज्ञान/जीव रसायन/चिकित्सा विज्ञान प्रयोगशाला चिकित्सा में डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (एमडी) या डिप्लोमा ऑफ नेशनल बोर्ड (डीएनबी) या क्लीनिकल विकृति विज्ञान में डिप्लोमा (डीसीपी) बैचलर ऑफ मेडिसिन फॉर बैचलर ऑफ सर्जरी एमबीबीएस सहित उपयुक्त विषयों में से किसी एक में डॉक्टर आफ फिलासफी (पीएचडी) होना अनिवार्य है, सिकल सेल बीमारी के ब्लड सैम्पल की जाँच प्रयोगशाला के परिणामों का निर्वचन के संबंध में रजिस्ट्रीकृत प्रोजेक्ट स्टाफ आवश्यक है, लेकिन विश्वविद्यालय के प्रोजेक्ट में ना तो एक भी नर्सिंग स्टाफ नियुक्त किए गए है, ना तो एमडी, ना ही डीएनबी और ना ही डीसीपी। एक भी प्रोजेक्ट स्टाफ आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार नियुक्त नहीं किए गए है, लेकिन विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के द्वारा समय-समय पर सिकल सेल के नाम पर जनजातियों की स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है तथा जनजातियों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करके जनजातीय मानव के जीवन के लिए खतरा पैदा किया गया है। विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के स्टाफ किसी व्यक्ति का ब्लड-सैंपल लेने के लिए योग्य ही नहीं है, ना ही वे ब्लड-सैंपल की जाँच करने के लिए पात्र है। आईसीएमआर ने तथा मध्यप्रदेश की सम्बंधित एजेन्सी ने विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के किसी भी स्टाफ को ब्लड-सैंपल लेने तथा उसकी जांच करने के लिए पंजीकृत नहीं किया है क्योंकि एक भी प्रोजेक्ट स्टाफ आईसीएमआर के गाइडलाइन के अनुसार न्यूनतम अहर्ता ही नहीं रखते है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय के सिकल सेल प्रोजेक्ट के स्टाफ अनूपपुर जिला के जनजातीय भाई बहनों का ब्लड सैंपल लेकर किस हैसियत से ब्लड की जांच कर रहे हैं? तथा कैसे पैथोलॉजी रिपोर्ट जनरेट कर रहे हैं? जबकि सिकल सेल ब्लड रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने का उनके पास कोई अधिकार ही नहीं है। इसके अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जाकर नर्स को भी गैरकानूनी ढंग से प्रशिक्षित कर रहे हैं, जबकि प्रशिक्षित करने वाले प्रोजेक्ट के स्टाफ खुद ही अयोग्य हैं। यह एकप्रकार से जनजातीय समाज के लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ तथा उनकी जीवन के लिए खतरा पैदा करने का अपराध है। इसमें सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि यह मामला अब राजभवन तक पहुंच गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन, जिला प्रशासन और संभाग प्रशासन के अधिकारियों से मिलकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने राज्यपाल महोदय को ही गुमराह करके जनजातीय भाई-बहन को ठग लिया है तथा सिकल सेल के नाम पर उन्हें भी बेवकूफ बनाने का प्रयास किया है। मीडिया के सामने वाहवाही लूट कर एक बेशर्मी का अपराध का सीमा विश्वविद्यालय ने पार कर दिया है, जो अत्यंत दुखद और शर्मनाक हरकत है। सिकल सेल पीड़ितों को विशेषज्ञ की सेवाएं मिलनी चाहिए थी लेकिन भाई-भतीजावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद में मदमस्त विश्वविद्यालय प्रशासन जनजातियों के जीवन एवं स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया है। प्रदेश के महामहिम राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय परिसर में बनाए गए उत्कृष्टता केन्द्र का फीता काटकर लोकार्पण किया उस जनजातीय संकाय में एक भी जनजातीय छात्रों को वर्ष 2021 में पीएचडी में प्रवेश नहीं दिया गया है वह भी उत्कृष्टता-केन्द्र के बजाय भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु है। इस गंभीर मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज करके दोषियों की गिरफ्तारी किया जाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले विश्वविद्यालय प्रशासन के कतिपय अधिकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन एवं धरना प्रदर्शन किया जाएगा। प्रोजेक्ट के स्टाफ वैधानिक सर्टिफिकेट के बगैर नियुक्त हो गए है, वैध डिग्री के बगैर चल रहे सिकल सेल लैब में ब्लड सैम्पल की जाँच झोलाछाप स्टाफ कर रहे है, वैधानिक सर्टिफिकेट नहीं होने के बावजूद अनूपपुर में फल-फूल रहे झोलाछाप स्टाफ सिकल सेल में मनमानी रिपोर्ट दे रहे है, संभाग तथा जिला के अधिकारी विश्वविद्यालय पर कदर मेहरबान है की राज्यपाल महोदय के कार्यक्रम में फर्जी जानकारी देने की तैयारी करवाने का कार्य कर रहे थे। इसका एक ताजा मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय में चल रहे भ्रष्टाचार का खुलासा करने के बजाय संभाग तथा जिला के अधिकारी झोलाछाप स्टाफ को बचाने में लगे रहे। आईसीएमआर के निर्धारित मानकों की सिकल सेल के ब्लड की जाँच करने के लिए स्टाफ की योग्यता क्या होनी चाहिए? इसकी जानकारी होने के बावजूद प्रशासन का मौन जनजातीय समुदाय के लिए ठीक नहीं है। विश्वविद्यालय जिस तरह से जनजातीय लोगों का ब्लड सैम्पल की जाँच कर सिकल सेल का उपचार कर रहा है वह जीवन से खेलने वाला अपराध है, बगैर पंजीकृत डिग्री के वे जाँच कर दवाएं लोगों को दे रहे है, कोई गलत दवा किसी मरीज को दी जाए तो उसके लिए बेहद घातक तथा जानलेवा साबित हो सकती है, विश्वविद्यालय प्रशासन सालों जनजातियों के जान से खिलवाड़ से कर रहा है तथा जिला प्रशासन मौन है। किसी भी स्टाफ को मेडिकल क्षेत्र में प्रायोगिक तथा ब्लड सैम्पल लेने तथा जाँच करने के लिए वैध डिग्री या डिप्लोमा की आवश्यकता होती है। इसके बिना किसी भी प्रकार का अभ्यास करना गैर कानूनी माना जाता है। ऐसे स्टाफ को किसी सिकल सेल मरीज का इलाज करने का भी अधिकार नहीं होता। अतः महोदय से प्रार्थना है कि मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के सामने फर्जी बनावटी जानकारी देने, आईसीएमआर गाइडलाइन के विरुद्ध जनजातीय समाज के लोगों के जीवन को खतरे में डालने, अपने पति को लाभ पहुँचाने के लिए छल करके समाज के विरुद्ध अपराध करने के जुर्म में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकटंक के झोलाछाप कार्यक्रम-संचालकों के खिलाफ इंडियन मेडिकल काउंसलिंग एक्ट 1956 की धारा 15 (2), 15(3), भारतीय दंड संहिता आईपीसी की धारा 336, 337, 338, 420 और ड्रग एक्ट की धारा 18 (ए, सी) के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर कानूनी कार्यवाही किया जाए।
शिकायत की प्रतिलिपि उच्च स्तर पर भी विधायक ने भेजी
पुष्पराजगढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक फुन्देलाल मार्कों ने शिकायत की प्रतिलिपि महामहिम राष्ट्रपति, राज्यपाल, भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, अध्यक्ष, राष्ट्रीय जनजातीय आयोग हर्ष चौहान, पुलिस महानिदेशक, सचिव डीएचआर और महानिदेशक आईसीएमआर प्रो. बलराम भार्गव, सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग डॉ रेणु स्वरूप को भी प्रेषित किया है।
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी ने आरोपों को बताया पुरी तरह से निराधार
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टर विजय दीक्षित ने पुष्पराजगढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक फुन्देलाल सिंह मार्कों द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताया। उन्होंने कहा कि विधायक जी को किसी ने गुमराह कर गलत जानकारी उपलब्ध कराई है। विश्वविद्यालय ने अपने नियम के तहत ही कार्य किया है। विश्व विद्यालय किसी भी जांच के लिए तैयार है।

 

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